गढ़वाल क्षेत्र का इतिहास
. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
-
गढ़वाल के बारे में सबसे प्राचीन उल्लेख स्कंद पुराण में केदारखंड नाम से मिलता है, और महाभारत में भी इसका उल्लेख है।
-
7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा-वृत्तांत में इसका ज़िक्र किया।
-
8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य गढ़वाल की हिमाच्छादित ऊँचाइयों तक आए, जोशीमठ की स्थापना की, और बद्रीनाथ व केदारनाथ के पवित्र मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया।
-
गढ़वाल नाम “गढ़” शब्द से बना है, जिसका अर्थ पहाड़ी क्षेत्रों में किले होता है। यहाँ अनेक छोटे-छोटे गढ़ (किले) थे, जिन्हें मिलाकर यह क्षेत्र बना।
-
इसे शिव की क्रीड़ास्थली भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ केदारनाथ, बद्रीनाथ, तुंगनाथ आदि प्रमुख तीर्थ स्थित हैं।
भौगोलिक परिभाषा (केदारखंड)
-
दक्षिण में गंगाद्वार (हरिद्वार) से लेकर उत्तर में श्वेतांग पर्वत (हिमालय) की श्रृंखलाओं तक,
-
पूर्व में बौधांचल (संभवतः बाधन पट्टी) से लेकर पश्चिम में तमसा नदी (टॉन्स) तक फैला क्षेत्र।
एकीकृत गढ़वाल की शुरुआत
-
15वीं शताब्दी में राजा अजय पाल ने 52 छोटे-छोटे रजवाड़ों को मिलाकर एक राज्य बनाया।
-
लगभग 300 वर्षों तक गढ़वाल का राज्य अस्तित्व में रहा, जिसकी राजधानी श्रीनगर (अलकनंदा के बाएँ किनारे) थी।
-
पुरातात्विक खुदाई से पता चलता है कि यह क्षेत्र मौर्य साम्राज्य का भी हिस्सा रहा है।
अन्य ऐतिहासिक नाम
-
पं. हरिकृष्ण रतूड़ी के अनुसार, यह पहाड़ी क्षेत्र जहाँ कई किले हों, गढ़देश या गढ़वार कहलाता था।
-
वैदिक काल में ऋग्वेद में इसे हिमवंत देश कहा गया है।
2. गढ़वाल राज्य – एक परिचय
-
गढ़वाल राज्य एक स्वतंत्र हिमालयी राज्य था, जो आज के उत्तराखंड के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित था।
-
स्थापना 688 ई. में कनकपाल ने की, जो पंवार वंश के संस्थापक थे।
-
यह राजतंत्र 688 से 1949 ई. तक चला।
राजधानियाँ (समय के अनुसार)
-
चांदपुरगढ़ी (888–1512 ई.)
-
देवलगढ़ (1512–1517 ई.)
-
श्रीनगर (1517–1804 ई.)
-
टिहरी (1816–1862 ई.)
-
प्रतापनगर (1862–1890 ई.)
-
कृतिनगर (1890–1925 ई.)
-
नरेंद्रनगर (1925–1947 ई.)
भाषाएँ – गढ़वाली, हिंदी, संस्कृत
3. समाज और संस्कृति
-
भाषा – गढ़वाली यहाँ की मुख्य भाषा है, जिसमें कई बोलियाँ हैं जैसे – जौंसारी, मार्ची, जढ़ी और सैलानी।
-
धार्मिक और जातीय समूह – गढ़वाल क्षेत्र में हिंदू धर्म का गहरा प्रभाव है, विशेष रूप से शैव मत का।
-
यहाँ राजपूत (आर्य मूल), ब्राह्मण (राजपूतों के बाद आए), और आदिवासी समुदाय (जौंसारी, जढ़, मार्चा, वन गुज्जर) रहते हैं।
-
-
त्योहार – दीवाली, होली, नवरात्रि के साथ-साथ विशेष गढ़वाली पर्व –
-
हरेला पर्व
-
फूलदेई
-
बसंत पंचमी
-
गंगा दशहरा
-
इगास (गढ़वाली दीवाली – सैनिकों की सुरक्षित वापसी पर मनाई जाती है)
-
-
पकवान – चैंसू, काफुली, झोली, तिल की चटनी
-
पारंपरिक परिधान –
-
पुरुष – कुर्ता-पायजामा, ऊनी कोटी
-
महिलाएँ – रंगीन सिर पर बाँधा जाने वाला दुपट्टा, ढीला कुर्ता, रंगीन कोटी, और ऊन/सूती का घाघरा।
4. गढ़वाल की प्रमुख वंशावली
(A) कत्यूरी वंश
-
कत्यूरी राजा मध्यकालीन शासक थे जिन्होंने वर्तमान उत्तराखंड के बड़े हिस्से (मुख्यतः कुमाऊँ) पर 800 ई. से 1100 ई. तक शासन किया।
-
इनका मूल स्थान जोशीमठ के पास बद्रीनाथ बताया जाता है, जहाँ से वे कत्यूर घाटी (कुमाऊँ) में आए।
-
इतिहासकार राहुल सांकृत्यायन के अनुसार, कत्यूरी शक वंश के वंशज थे और खस जाति से संबंधित थे।
-
संस्थापक – वासुदेव कत्यूरी (850–870 ई.)
-
ये शैव धर्म के अनुयायी थे और अपने शासन में मंदिर निर्माण के लिए प्रसिद्ध रहे।
प्रशासनिक व्यवस्था
-
राजधानी प्रारंभ में जोशीमठ और बाद में कत्यूर घाटी रही।
-
निंबार्तदेव प्रथम कत्यूरी राजा थे जिन्होंने मंदिर वास्तुकला की शुरुआत की।
-
प्रमुख मंत्रीमंडल –
-
प्रधानमंत्री (अमात्य)
-
धार्मिक मामलों के मंत्री
-
युद्ध व शांति मंत्री
-
सेनापति (महासामंत)
-
प्रशासनिक इकाइयाँ
-
प्रांत, विषय (जिले), क्षेत्र – इनके अधिकारी क्रमशः उपरिक, विषयपति, क्षेत्रपाल।
-
गाँव – सबसे छोटी इकाई, प्रमुख को महामनुष्य कहा जाता था।
सैन्य व्यवस्था
-
चार भाग –
-
पदातिक (पैदल सेना)
-
गजारोही (हाथी सवार)
-
अश्वारोही (घुड़सवार)
-
ऊँट सवार सेना
-
-
सैन्य विभाग का प्रमुख महासामंत था।
वास्तुकला
-
कत्यूरी काल उत्तराखंड का स्वर्ण युग माना जाता है।
-
प्रमुख मंदिर – वासुदेव मंदिर (जोशीमठ), मनीला देवी मंदिर (अल्मोड़ा), कटारमल सूर्य मंदिर।
पतन
-
11वीं शताब्दी के अंत में चंद वंश ने गढ़वाल व कत्यूर क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की और कत्यूरी साम्राज्य छोटे राज्यों में बिखर गया।
(B) परमार वंश
-
9वीं शताब्दी तक गढ़वाल 52 छोटे-बड़े ठाकुरों के अधीन था।
-
887 ई. में गुजरात के धार नगर के राजा कनकपाल तीर्थयात्रा पर गढ़वाल आए, जहाँ चांदपुरगढ़ के राजा भानुप्रताप ने उनका स्वागत किया और अपनी पुत्री का विवाह उनसे किया।
-
888 ई. में कनकपाल ने चांदपुरगढ़ (चमोली) में परमार वंश की स्थापना की।
-
इस वंश के 37वें राजा अजय पाल ने सभी गढ़पतियों को पराजित कर गढ़वाल को एकीकृत किया और राजधानी देवलगढ़ से 1517 ई. में श्रीनगर स्थानांतरित की।
गोरखा आक्रमण
-
1790–91 ई. में गोरखाओं ने हमला किया, लेकिन हार गए।
-
1803 ई. में अमर सिंह थापा और हस्तिदल चौतारिया के नेतृत्व में गोरखाओं ने फिर आक्रमण किया और गढ़वाल व कुमाऊँ का बड़ा भाग जीत लिया।
-
1804 ई. में प्रद्युम्न शाह युद्ध में मारे गए।
5. गढ़वाल राज्य का प्रशासन
राजस्व व्यवस्था
-
कृषि आधारित समाज, साथ ही प्रचुर वन संसाधन।
-
वरिष्ठ अधिकारी – उपजिलाधिकारी (SDM), तहसीलदार, कनूनगो, पटवारी, प्रधान, ठोकदार।
-
पटवारी – राजस्व वसूली, भूमि अभिलेख और माप-तौल का कार्य करता था।
पुलिस व्यवस्था
-
दो प्रकार – राजस्व पुलिस (गाँवों में) और शहरी पुलिस।
-
टिहरी के राजा प्रताप शाह ने पुलिस विभाग स्थापित किया, पहला थाना टिहरी में था।
प्रमुख अधिकारी
-
वज़ीर – सभी विभागों का प्रमुख।
-
मुख्तार – दूसरे दर्जे का अधिकारी, राजा के अक्षम होने पर सभी अधिकार इन्हें मिलते थे।
-
दफ्तरी – नियुक्ति, वेतन, स्थानांतरण और पुरस्कार का जिम्मेदार।
-
फौजदार – सेना प्रमुख।
-
गोलदार – किलों व महत्वपूर्ण स्थानों की सुरक्षा।
स्थानीय स्वशासन
-
1922 में टिहरी गढ़वाल राज्य ने पट्टी पंचायत प्रणाली शुरू की, जो प्राचीन परंपराओं पर आधारित थी।
6. अर्थव्यवस्था
-
मुख्यतः कृषि आधारित।
-
भूमि के प्रकार –
-
अव्वल (उपजाऊ, सिंचित)
-
उप्राउ (पहाड़ी)
-
इज़रान (अकृषित)
-
-
पौड़ी, लैंसडाउन, चमोली में चाय बागान।
-
तिब्बत से व्यापार – नीति व माना दर्रा (मई-जून में बर्फ पिघलने पर खुलते थे)।
-
निर्यात – जौ, धान, गेहूँ, झंगोरा, मडुआ।
-
आयात – नमक, भेड़, कुत्ते, ऊन, ऊनी वस्त्र, कालीन।
-
भाबर क्षेत्र से आयात – चीनी, कपड़ा, लोहा।
7. न्याय व्यवस्था
-
-
तीन भाग – दीवानी, फौजदारी, राजस्व।
-
1815 तक कोई औपचारिक न्यायालय नहीं था।
-
राजा स्वयं या अपने अधिकारियों (दिता, हाकिम-इलाका) के माध्यम से न्याय देता था।
-
छोटे मामले गाँव में ही निपटा दिए जाते थे।
-
1870 – राजा प्रताप शाह ने मुख्य न्यायालय (Chief Court) की स्थापना की।
-
1938 – राजा नरेंद्र शाह ने टिहरी गढ़वाल राज्य उच्च न्यायालय की स्थापना की।
8. गोरखा आक्रमण और ब्रिटिश कब्ज़ा
-
1803 ई. – अमर सिंह थापा और हस्तिदल चौतारिया ने गढ़वाल पर आक्रमण किया। राजा प्रद्युम्न शाह श्रीनगर चले गए।
-
14 मई 1803 – खुर्बुरा की लड़ाई में प्रद्युम्न शाह वीरगति को प्राप्त हुए।
-
राजा सुदर्शन शाह ने अंग्रेजों से मदद मांगी।
-
गार्डनर और निकोलसन के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने गोरखाओं को पराजित किया।
-
28 नवम्बर 1815 – सुगाौली संधि हुई, जिसके तहत:
-
गोरखाओं ने गढ़वाल और कुमाऊँ ब्रिटिशों को सौंप दिया।
-
नेपाल सरकार ने काठमांडू में ब्रिटिश रेजीमेंट रखने पर सहमति दी।
-
-
सुदर्शन शाह 5 लाख रुपये देने में विफल रहे, जिसके कारण उन्हें श्रीनगर छोड़कर टिहरी को राजधानी बनाना पड़ा।
-
1839 तक ब्रिटिश गढ़वाल कुमाऊँ कमिश्नरी के अधीन रहा, फिर श्रीनगर नया जिला बना।
9. राजनीतिक असंतोष के कारण
-
अप्रत्यक्ष ‘फूट डालो और राज करो’ नीति – ब्रिटिशों ने ऐसे प्रधान और ठोकदार बनाए जो उनके वफादार थे और आम जनता से अलग हो गए।
-
वन प्रबंधन – संरक्षण के नाम पर ग्रामीणों को जंगल के संसाधनों (भोजन, चारा, लकड़ी) से वंचित किया।
-
हथियार नियंत्रण – खुकरी रखने पर प्रतिबंध।
-
कूली बेगार प्रणाली – जनता से जबरन श्रम लिया जाता था।
10. गढ़वाल के राजनीतिक आंदोलन
गोरखा काल (1803–1815)
-
जिसे ‘गोरख्याणी’ कहा गया – क्रूर और अन्यायपूर्ण शासन।
प्रमुख घटनाएँ
-
1919 – बैरिस्टर मुकुंदी लाल और अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने गढ़वाल में राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की।
-
1919 – गढ़वाल परिषद बनी, जिसने रॉलेट सत्याग्रह में भाग लिया।
-
1921 – कूली बेगार आंदोलन।
-
1930 – पेशावर कांड (23 अप्रैल) के बाद पौड़ी गढ़वाल में सत्याग्रह समिति का गठन, दुगड्डा में सम्मेलन जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू शामिल हुए।
-
1930 – भोला दत्त चंदोला और महेशनंद थपलियाल ने इबेटसन पर पत्थर फेंके, तीन महीने की कैद हुई।
-
भवानी लाल रावत ने चंद्रशेखर आज़ाद को अपने गाँव में लाकर युवाओं को निशानेबाज़ी सिखाई।
-
1940 – गांधीजी के व्यक्तिगत सत्याग्रह में कर बंदी, शराब बंदी और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार के आंदोलन चले।
11. प्रजामंडल क्रांति
-
1938 – श्रीदेव सुमन ने देहरादून में प्रजामंडल की स्थापना की, जिसका उद्देश्य उत्तरदायी शासन था।
-
उन्हें राजद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया गया और भूख हड़ताल के दौरान मृत्यु हो गई।
-
इसके बाद नागेंद्र सकलानी, मोलू सिंह और दौलतराम ने नेतृत्व संभाला।
-
10 जनवरी 1948 – इन नेताओं ने टिहरी न्यायालय पर कब्ज़ा किया।
-
पुलिस गोलीबारी में नागेंद्र सकलानी और मोलू सिंह शहीद हुए।
-
चंद्र सिंह गढ़वाली और जयनंद भट्ट ने उनके शवों को टिहरी लाकर अंतिम संस्कार कराया।
-
इसके बाद आजाद पंचायत की स्थापना हुई और टिहरी पर कब्ज़ा कर लिया गया।
-
राजा मनवेन्द्र शाह ने 15 जनवरी 1948 को उत्तरदायी शासन की घोषणा की।
-
जनता ने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की, और सकलाना जैसे क्षेत्रों में विद्रोह हुए।
-
1 अगस्त 1949 – टिहरी का विलय उत्तर प्रदेश में हो गया।
12. वर्तमान गढ़वाल
-
उत्तराखंड में 13 जिले हैं, जो दो प्रशासनिक मंडलों – कुमाऊँ और गढ़वाल – में विभाजित हैं।
-
गढ़वाल हिमालय में स्थित है, इसकी सीमाएँ:
-
उत्तर – तिब्बत
-
पूर्व – कुमाऊँ
-
दक्षिण – उत्तर प्रदेश
-
उत्तर-पश्चिम – हिमाचल प्रदेश
-
-
गढ़वाल मंडल के जिले – चमोली, देहरादून, पौड़ी गढ़वाल, टिहरी गढ़वाल, हरिद्वार, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी।
-
प्रमुख स्थल –
-
चार धाम – केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री
-
फूलों की घाटी, नंदा देवी शिखर आदि।
-
Comments
Post a Comment